Wednesday, January 05, 2005

भारत में ठरकीपने का भविष्य

भई ईस ब्लाग पर कम ही लोग आ रहे हैं पर ईसका यह मतलब नही है की हम अनाप शनाप लिखने लगें | आखिर हिन्दी फिल्म के निर्माता थोङे ही हैं | पर जीतु भैया का ब्लाग पङ कर दिमाग दौङा | थोङा गूगलाऍ | फिर यह विचार आया जो हम आपके सामने पेश करते हैं | नही जमें तो जम के टाँग खीँचिऐगा |
भारत में सेन्सर बोर्ड को बदल कर रेटिंग बोर्ड कर देना चाहिऍ | खुल्ला खेल मुरादाबादी | बनाओ जी भर कर नंगापा | देंखे कितने दिन चलता है | अब आप कहेंगे की बच्चों पर असर तो जनाब विदेंशो मे पल रहे भारतीय बच्चों की तुलना करें दिल्ली के बच्चों से | आप हैरान रह जाऍँगे | भारत में जो भोंडे विडियो सभी चैनलो पर दिखा रहे हैं वैसे भी ज्यादा कुछ बचा नही है सेन्सर करने के लिऍ | हाँ हाल में पोस्टर और ईश्तेहार आदि नही दिखाँऍ ताकि छोटे बच्चों पर असर ना पङे | और कानुनी तौर पर पक्का किया जाऍ की अश्लील सामाग्री केवल वयस्कों को ही मिले |
महानगरों से ले कर कस्बों तक वैसे भी अनैतिक रिश्ते, बेशर्मी फैल चुकी है | डेनमार्क आदि देशों मे पाया गया है की जब रोक टोक व कानूनी बन्दिशें हटा ली जाती है तो इस विषय से ध्यान हट जाता है | पाया गया की सैक्स से जुङे अपराध भी कम हो गऍ | तो यह था मेरे दो सिक्के | चालू हो जाईऍ छापना |

5 Comments:

Blogger आलोक said...

चक्कर तो यह है कि हिन्दुस्तान में कोई मानने को तैयार ही नहीं है कि कामुकता नाम की कोई चीज़ होती है। इसलिए अग़र आप नियम बनाएँ कि ठरक पूर्ण सामग्री जायज़ तौर पर लेकिन केवल वयस्कों के हाथ दी जाएगी तो समाज सेवी लोग कहेंगे कि यह सब हिन्दुस्तान में हो कैसे सकता है यहाँ तो सब मर्यादा पुरुषोत्तम बैठे हैं। इसीलिए सब चोरी छिपे होता है और उसके ही नतीजे आपके सामने हैं।

8:59 AM  
Blogger अनूप शुक्ला said...

लिखते रहो.लोगबाग आयेंगे.वैसे अनाप-सनाप लिखनेवाला कहता थोड़़ी है वो अनाप-सनाप लिख रहा है.

10:43 AM  
Blogger Jitendra Chaudhary said...

अब ठरकीपने पर क्या बात करें.
मस्तराम डाइजेस्ट गली गली मे मिलती है, सेक्स की जानकारी दोस्त यार करवा ही देते है, बच्चो पर टीवी फिल्मो का प्रभाव इतना बढ गया है कि प्रेक्टिकल करने के लिये स्कूल की जगह ही माकूल लगती है, सारे के सारे बच्चों मे जल्दी बड़ा होने की होड़ है. जाने कौन सा तीर मार लेंगे बढे होकर.दूसरी तरफ समाजसेवी लोग है कि अभी भी पुरातन काल मे जी रहे है......यहाँ पर बच्चो के बुकशैल्फ से रामायण या पंचतन्त्र की किताबे नही मिलती.....बल्कि डेबोनेयर वगैरहा जैसी मैगजीन दिखती है.

कुल मिलाकर विचारो मे दोगलापन है, सब जानते है कि गलत हो रहा है, या तो रोको या फिर इसको लीगलाइज करों......सबको अपना जोश निकाल लेने दो.....थोड़े ही दिनो सब कुछ नार्मल हो जायेगा.

और ब्लाग लिखना, मन की भड़ास है, लिखते रहो...कितने लोग पढ रहे है ये मत गिनो.....और हाँ अपना लोगो की गिनती वाला काउन्टर उठाकर कूड़े मे फेंक दो, ना रहेगा बांस, ना बजेगी बांसूरी.जब तक लोगो की गिनती करते रहोगे ...लिख नही पाओगे....

12:10 PM  
Blogger eSwami said...

ठरकीपने का क्या अर्थ है? यौनाचार या व्याभिचार! मेरे विनम्र विचार में, ठरकीपना रसिक प्रवृत्ती या शौकीन मिज़ाजी तो कतई नही है - वो चीज़ अलग है.
कम आयु वर्ग में यौनाचार का भविष्य उज्जवल है और अधिक आयु वर्ग मे व्याभिचार का. वो ऐसे की पहले कम उम्र में वो हासिल नही था जो अब होगा, पहले भूख थी, उम्र के दूसर पडाव मे एक ही सब्जी या दो से काम चल जाता था अब भाँती-२ के व्यंजन होना. भूख का स्थान तृप्ती लेगी और तॄप्ती बाद में बोरियत मे बदल कर नयापन तलाशेगी. तो ये सम्भव है की यौन अपराध कम हों पर टूटे रिश्तों की भरमार, बिखरे परिवार और दिलों पर वार, अपन को तो ये दीखे है, फ़्यु-चर्रर्र मोर-चर्रर्र होता हुआ. ;-)

8:35 PM  
Blogger Joydeep said...

waise to main uttar pradesh ka hu, par bangali hu...to es tarah..kuch kuch dono bashao ka prabav mere zindagi me raha hai. dono bashai apne apne chetr me ullekhnie hai.

bharat hamesha se hi tharakpan ka shikar raha hai, appsabko to yaad hi hoga, hamne hi kamasutra ho janm diya hai. par aaj kal ke hamare naujavan jinme ki main bhi shamil hu, is vichar ko ek alag hi dhan se dekhna pasand karte hai, iski wajah hamari badli hui vichar hai jo ki samay ke saat saat badal rahe hai. main yeh nahi kahata ki jo bhi ham kar rahe hai wo sahi hai, par mai is chez ko bhi manta hu ki jaise jaise hum bade hote jaa rahe hai, hum nayi cheeze sikhte jaa rahe hai, kuch galat aur kuch sahi aur umeed ki ja sakti hai ki samay ke saat hum sahi vichaaro ko hi apnaenge.

8:50 AM  

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