Thursday, January 13, 2005

बूल्ला की जाना

भई यह गाना आप सभी सुनें http://www.musicindiaonline.com पर | बहुत बङिया बन पङा है | आज बूल्ला की जाना की लय में दिमाग खुजलाया की मैं कौन | यह खतरनाक खयाल हमने श्रीमती जी को बताया तो श्रीमती जी फौरन कङक चाय और मीठी फटकार और फिर मीठी चाय और कङक फटकार ले कर बेताल के माफिक सर पर सवार हो गईं | बोली " यह तरकीब नही चलेगी | मैं कौन तक ठीक है अगर बोले तुम कौन तो फिर देखियेगा !".
तो आज ऍक शानदार अमेरिकन दिन बीता | अब आप कहेंगे की माजरा क्या है | यह अमेरिकन दिन क्या चीज है | अमेरिका की खासियत है जीवन की नियमितता | वही सुबह का नाश्ता, ठीक उसी समय आँफिस पहुँचना | वही काम, ठीक समय पर अमुमन वही खाना | औसतन ठीक समय पर घर की और रवानगी फिर वही टी वी और सोना | सप्ताहन्त का समय भी नियम से ही बितता है | यह बात कुछ अजीब नही लगती आप सभी को | मुझे तो लगती है |

वैसे अबकी भारत यात्रा मैं अपने मित्रों से मिलकर दुख हुआ | उनके महानगरीय जीवन की आपाधापी देख कर अमेरिका की जीवनशैली ही भायी | जो भारत मैंने छोङा था वहाँ मै कभी नही रह पाऊँगा | छोटे शहरों की हवा ही भाती है मुझे | महानगरों के जीवन से मन घबराता है | पर जीवन यापन के लिऍ क्या करूँगा मैं जबलपुर, ऊज्जैन, भोपाल जैसे शहरों मैं ? जब ईन शहरों मे जाओ तब जीवन जीये जैसा लगता है | खैर ...

1 Comments:

Blogger eSwami said...

बुल्लेया की जाणां मैं कौणमुझे तो वडोली बन्धु द्वारा गाया गया शास्त्रीय और आँचलिक या लोक संस्करण ज्यादा भाता है. दोनो कि कडियां, काफ़ी का टूटा-फ़ूटा हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है. अनुवाद मे गलती की संभावना है इस लिये पहले ही माफ़ी मांग लेता हूँ.

8:09 PM  

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