Monday, October 17, 2005

दूध उबल रहा है.

आज का दिन है "कोजागिरी पूर्णिमा" का. यानि भारत वर्ष में अनेकोनेक जगह दूध उबाला जाएगा. बढिया रात तक गली मोहल्लों में गीत संगीत का माहौल रहेगा.रात १२ बजे चकाचक औटाया हुआ,उबाला हुआ दूध पीया जाएगा.उबाल से सुझा कि हर जगह कैसे उबाल मचा है. कलकत्ता में बंगाली भाई उबल रहे हैं. दादा को हाथ मरोङ कर बाहर जो बैठा दिया है चपल चैपल चाचा ने. पुतले जले नारे बने पर भैया मोरे किरन मोरे का जरा दिल नही पसीजा. दादा की सुट्टी पुट्टी गुम है. "ए टु डालमिया, दैन फाल दादा" जैसी स्थिति बनी हुई है. हमाारा तो यही कहना है दादा से
"गर्दिश में हों तारे,
ना घबराना प्यारे,
गर तु हिम्मत ना हारे,
तो होंगे वारे-न्यारे"

यहाँ अमेरिका की जनता उबल रही है तेल, मकानों की कीमत गिरने के भय तथा ईराक युद्ध में रोज अमेरिकी नागरिकों की मौतों से. अर्थ शास्त्र के नियम वैसे तो यहाँ लागु होते नही हैं. जैसे सभी जागरुक जन जानते हैं अमेरिका प्रतिवर्ष दुनिया से कर्जा लेने में सबसे आगे है. आयात-निर्यात में ऐसी असमानता तथा दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश की ऐसी आर्थिक बदहाली ईतिहास में कभी नही देखी गई. खैर मुद्दे की बात यह है की घरों की कीमतों ने यहाँ पर बाजार को स्थिर कर रखा था. लोग मकान के लोन को बढा कर उस पैसे को खर्च कर रहे थे. ईसी की वजह से खपत अच्छी रही और बाजार सम्भला रहा. जब यह मार्केट ठहराव पर आया तो असर सभी क्षेत्रों मे महसुस होगा. अब देखें क्या होता है आगे. ऊर्जा जिसमें तेल भी शामिल है, यही असली मुद्दा बन गई है. हम - आप तो ९० के दशक के खाङी युद्ध से ही लुट रहे है. अब चीन, भारत तथा अन्य देशों की बढती ऊर्जा माँग ने स्थिति चिन्ताजनक कर दी है, खासतौर पर बढी-२ गाङियोँ के मालिकों की. यह गाङियाँ १० मील प्रति गैलन का औसत देती हैं. बुश सरकार के निकम्मेपन की हर जगह थू - २ हो रही है पर रंग और धर्म के नाम पर वह भी चलेंगे २००८ तक और शायद फिर कोई धर्म के नाम पर चुनाव जीत कर आ जाए.

भारत के महामहिम अलग उबल रहे हैं गुगल अर्थ पर. बेेेवजह ही उबल रहे हैं मेरी माने तो. जिनके पास नक्शे नही होने चाहिए वो तो सेटेलाईट ईत्यादि के माध्यम से या फिर कहीं घूस खिला के निकाल ही लेंगे.

गुगल से याद पढा, यहाँ पर (फिनिक्स में) गुुगल कम्पनी नया आफिस खोल रही है. अब बेंगलोर तो है नही की हर कम्पनी आफिस खोले. सनसनी मची हुई है बाजार में. हर व्यक्ति स्वयँ को गुगल के अगले कर्मचारी के रुप में देख रहा है. हम अपनी औकात में बने हुए हैं पर आवेदन तो डाल ही दिए हैं. क्या पता अपनी ही निकल पङे. फायदा यह रहा की कमसकम ६०० लायक लोग यहाँ पर नौकरी करेंगे मतलब ४०० - ६०० नई नोकरियाँ फिनिक्स में बनेंगी. वैसे तो हम कम्पनी भक्त रहे (आखिर हमारी ईतनी हरामखोरी झेल कर भी हमें अभी तक रखा जो हुआ है) पर ईस देॅश में तो नौकरी का ऐसा ही कुछ हिसाब है की जहाँ अच्छी दिखे वहाँ फिसल लो.

फिनिक्स में आज बिन मौसम बरसात हुई. मजा आ गया बारिश की बुंदो की आवाज खिङकी के काँच पर सुनकर. कभी शाँति से सुनिएगा अगर नही सुना हो तो. या कभी नाव पर बैठ कर एकान्त में पानी के नाव से टकराने की आवाज को. एक अलग ही अनुभव है. भोपाल में बङे तालाब पर बैठ कर लहरों के थपेङों को सुनते हुए चने मुरमुरे चबाना, क्या जमाना था वो भी. अगर कभी भोपाल जाने का मौका लगे तो बढे तालाब पर और रविन्द्र भवन के पीछे की सङक पर कुछ समय जरुर बिताईएगा. एकांतचित्त बैठ कर मजा आ जाएगा. मौका लगे तो भदभदा बाँध भी जरुर जाएँ. जबलपुर में नर्मदा मैया पर बने बर्घी डैम पर भी कुछ ऐसा ही विहंगम नजारा रहता है. समुद्र के समान विशाल पानी का विस्तार जो जबलपुर से खँडवा को जोङ रहा है और हर तरफ हरियाली ही दिखाई देती है.

आज कोई एक ख्याल मन में नही आ रहा तो बेमकसद लिख रहा हुँ और आप भी अभी तक पढ रहे हैं.जाते जाते एक जोरदार रेसिपि:
२ भााग वोडका
१ भाग कालुआ
३ भाग क्रीम या दुध
बर्फ १/३ गिलास

सभी सामग्री शेक करें, लीजिए "व्हाीईट रशियन" तैयार.

भई बात शुरु हुई औटाए हुए दुध पर और मामला व्हाीईट रशियन पर आ गया है. बेहतरी ईसी में है की कलम घिसना अगली बार तक ले लिए बंद कर दिया जाए.

2 Comments:

Blogger Laxmi N. Gupta said...

कालीचरन जी,

मज़ा आगया। बहुत बढिया लिखा है।

4:31 AM  
Blogger अनूप शुक्ला said...

जब बेमकसद लिखते हो भोपाली भाई तो उम्दा लिखते हो। ई जो आर्थिक चिंतन है उसको अलग समेटो कभी फैला के लिखो। अउरई जो आवाज है न खिड़की से सट के बारिश की बूंदों वाली उ ज़राकुछ और सुनाओ विस्तार से।

6:22 PM  

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