tag:blogger.com,1999:blog-9337690.post-51220550474168648972007-05-26T20:35:00.000-07:002007-05-26T20:37:27.735-07:00वापसभीमसेन साहब के राग विहग को सुन कर मन कुलबुलाया, ऊगलियोँ में कुछ बैचेनी सी महसुस हुई और लगने लगी दनादन मार की-बोर्ड पर. चलो हम वापस आ गऍ. अपनी मात्रा की गलतियोँ, सोच की अपरिपक्वता लिये हुऍ. पढने का मन हो तो पढो, नही तो आगे बढो. जैसे चिठ्ठा जगत के <A href="http://www.hindini.com/fursatiya/">पितामह</A> कह दिये "हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिह" तो हम भी ईसी भाव से लिखेंगे. किसी के मन में मात्रादोष ठीक करने का कीडा हो तो हमारे बचपन के हिन्दी के मास्टर का नम्बर भेज देंगे. सभी भारी भरकम बुजुर्ग जनों को साधुवाद. वैसे कोई बताऍ लाल साहब ईतने भारी हैं, कम्बख्त उडन तश्तरी कैसे उडती होगी.<br /><br />आज तो वापसी करी है, जरा सुस्ता लुँ यारो बहुत दिनों के बाद लौटा हुँ भाटबाजी की दुकान में. रफत में आने में समय तो लगेगा.Kalicharanhttp://www.blogger.com/profile/13820034560677352485noreply@blogger.com